संदेश

2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
अखबार और न्यूज़ चेनल अखबार और न्यूज़ चेन्नल को पढने और देखने के पीछे हमारा उद्देश्य देश,विदेश,और समाज में घट रही घटनाओं को जानना होता है। पर बहुत हद तक न्यूज़ चैनल्स अपना मुख्य उदेश्य भूल ही गए है.इन्हे याद है तो बस अपने चैनल की टी.आर. पी और समाज को क्या दिखाना जरुरी इससे कोई मतलब नही है.हमें यह कहते बिल्कुल संकोच नही होगा के न्यूज़ चैनल टी.आर.पी की दोड़ में शामिल है.इन्हे इससे कोई लेना देना नही है की जो ख़बर ये दिखा रहे है उसका हमारे पर क्या असर पढ़ रहा है .आज न्यूज़ चैनल में जल रहे आदमी की कवरेज को बहुत नाटकीय ढंग से प्रस्तुते किया जाता है इस घटना को सनसनीखेज बना दिया जाता है.आज यदि कोई रिपोर्टर के सामने कोई व्यक्ति जल रहा होगा तो वो उसे शूट करना पसंद करेगा बजाये उसे बचाने के,उस रिपोर्टर के लिए उस आदमी कीजान की कोई कीमत नही होती.और हम लोग २६ नवम्बर २००९ के मुंबई में हुए आतंकी हमले की जो कवरेज न्यूज़ चेनल्स ने की थी उसे भी नही भुला सकते.पुरे विशव को इस घटना ने दिल देहला दिया था पैर हमारे न्यूज़ चेनल्स ने ऐसी कवरेज दिखाई के पुरे मीडिया जगत को शरमसार होना पड़ गया था इससे अंदाजा लगाया जा...
सच का रास्ता ही दिल तक जाता है वक्त ने देखा है सबको उसे चलते भले देखता न हो कोई बड़े-बडे शिलालेखों पर नाम खुदवाकर कई राजाओं ने होने की कोशिश की उनके हटते ही उनका नाम लेवा भी रहा कोई कई अमीरों ने बनवाये अपने नाम से महलवक्त की मार से खँडहर में बदल गए अब देखता भी नहीं कोई आँखों से बसे कानों से सुने हाथों से स्पर्श किये गए जिंदा और मुर्दा बुत भुला दिए गए बसे दिल में लोगों के चलते हैं आज भी वक्त उनको नहीं मिटा पाता दौलत से न खरीदा जा सकता शोहरत से पसीजा नहीं करता शरीर को छू लेने से भी दिल किसी का अपना नहीं हुआ करता वह सच ही है जो दिल में बसा करता है दिमाग में कई ख्याल आते हैं दिल में तो बसता है एक कोई दौलत और शौहरत के ढेर पर बैठकर वक्त को जीत कादावा करने वालों तलवार के जोर परलोगों को डराने वालों अपनी सूरत पर इतराने वालों वक्त सबको मिटा देता है पर दिलों में बसे हुए नाम और तस्वीरों पर उसका रंग नहीं चढ़ता कोई सच ही वह रास्ता है जिस पर दिल के दरवाजे तक पहुंचता है कोई...
मेरे सपने.... वर्षों से रेगिस्तान के , इस तपती धूप में, एक बूंद पानी की आस मे, खड़ी हुँ, शायद कभी तो .... सहसा एक दिन, दुर आकाश मे, मुझे मेरे सपनो का, आशाओं का वो रंग दिखेगा , क्या जमीन की तरह, आसमान में भी, ये मरीचिका तो नही ? नही? वो तो मेरी तरफ ही आ रही थी। उसकी बढती नजदिकियां, कम कर रही थी, मेरे दर्द को, बढा रही थी, मेरे प्यास को, लेकिन, वक्त की आंधी, उड़ा ले गयी उसे, दुर, बहुत दुर, अब तो लगता है, वो एक मरीचिका सी...

शुरुआत

आज मेने ब्लॉग लिखने की शुरुआत की ...मन में लिखने को तो बहुत कुछ है,बस जरुरत है शब्दों को एक धागे में पिरोने की...